श्रीमद्भगवद्गीता
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रो कुरुक्षेत्रो समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।1।।
धृतराष्ट्र बोले, ‘हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?’
संजय को वेदव्यास जी के द्वारा दिव्य दृष्टि मिली हुई थी। इसलिए वे युद्ध का आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाने में सक्षम थे। अतः युद्ध का हाल सुनने की इच्छा से धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा कि धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित मेरे और पांडवों के पुत्रों ने क्या किया?
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसम्य राजा वचनमब्रवीत्।।2।।
संजय बोले, ‘उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह रचनायुक्त पांडवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।’
अर्थात्् पांडव सेना की व्यूहरचना इतनी विचित्र ढंग से की गई थी कि उसे देखकर दुर्योधन चकित रह गया और वह घबराकर द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। वह सोचा कि धनुर्विद्या में पारंगत द्रोणाचार्य भीष्म पितामह को उससे भी जटिल व्यूहरचना के लिए कहेंगे। दुर्योधन द्रोणाचार्य को अपने पास बुला सकता था, लेकिन महावीर द्रोणाचार्य के दिल में अपने लिए तहेदिल से प्रेम और भावुकता पैदा करने के लिए अधर्मी दुर्योधन चापलूसी से द्रोणाचार्य के पास गया।

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