Saturday, May 18, 2019

geeta shloka 3-11

पश्यैतां पाण्डु पुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रोण तव शिष्येण धीमता।।3।।

‘हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्रा धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की बड़ी भारी सेना को देखिए।’

परम कुटनीतिज्ञ दुर्योधन सेनापति द्रोणाचार्य को अपनी ओर विशेष रूप से मिलाने के लिए अर्जुन की पत्नी द्रोपदी के पिता राजा दु्रपद का नाम लेता है। द्रोणाचार्य की राजा द्रुपद से पुरानी शत्राुता थी। राजा द्रुपद ने एक महान यज्ञ करके वरदान स्वरूप एक ऐसे पुत्र घृष्टद्युम्न की प्राप्ति की थी, जो द्रोणाचार्य का वध कर सके।
अत्रा शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।

युयुधानो विराटश्च दु्रपदश्च महारथः।।4।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च  वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च   नरपुÂवः।।5।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च  सर्व  एव  महारथाः।।6।।

‘इस सेना में बड़े३बड़े धनुषोंवाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद,  धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्रा अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं।’
तदुपरांत दुर्योधन अपने प्रमुख सेनानायकों की चर्चा करता हुआ कहता है-

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते।।7।।

‘हे ब्रा›णश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो३जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूं।’

भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्थैव च।।8।।

‘आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्रा भूरिश्रवा।’

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।नानाशस्त्राप्रहरणाः  सर्वे  युद्धविशारदाः।।9।।

‘और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देनेवाले बहुत३से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब३के३सब युद्ध में चतुर हैं।’

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।10।।

‘भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।’
स्पष्ट है, दुर्योधन द्वेष और चिर शत्राुतावश भीम को ही मात्रा बलशाली समझता है और मूढ़तावश भगवान श्रीकृष्ण को अनदेखा कर देता है। भगवान की उपेक्षा ही उसकी हार का प्रमुख कारण बना।

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।11।।

‘इसलिए सब मोर्चे पर अपनी अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सभी निःसंदेह भीष्मपितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।’
दुर्योधन की बात सुनकर भीष्म पितामह उसे खुश करने के लिए जोर से शंखध्वनि करने लगे।

पश्यैतां पाण्डु पुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रोण तव शिष्येण धीमता।।3।।

‘हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्रा धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की बड़ी भारी सेना को देखिए।’

परम कुटनीतिज्ञ दुर्योधन सेनापति द्रोणाचार्य को अपनी ओर विशेष रूप से मिलाने के लिए अर्जुन की पत्नी द्रोपदी के पिता राजा दु्रपद का नाम लेता है। द्रोणाचार्य की राजा द्रुपद से पुरानी शत्राुता थी। राजा द्रुपद ने एक महान यज्ञ करके वरदान स्वरूप एक ऐसे पुत्र घृष्टद्युम्न की प्राप्ति की थी, जो द्रोणाचार्य का वध कर सके।
अत्रा शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।

युयुधानो विराटश्च दु्रपदश्च महारथः।।4।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च  वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च   नरपुÂवः।।5।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च  सर्व  एव  महारथाः।।6।।

‘इस सेना में बड़े३बड़े धनुषोंवाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद,  धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्रा अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं।’
तदुपरांत दुर्योधन अपने प्रमुख सेनानायकों की चर्चा करता हुआ कहता है-

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते।।7।।

‘हे ब्रा›णश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो३जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूं।’

भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्थैव च।।8।।

‘आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्रा भूरिश्रवा।’

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।नानाशस्त्राप्रहरणाः  सर्वे  युद्धविशारदाः।।9।।

‘और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देनेवाले बहुत३से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब३के३सब युद्ध में चतुर हैं।’

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।10।।

‘भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।’
स्पष्ट है, दुर्योधन द्वेष और चिर शत्राुतावश भीम को ही मात्रा बलशाली समझता है और मूढ़तावश भगवान श्रीकृष्ण को अनदेखा कर देता है। भगवान की उपेक्षा ही उसकी हार का प्रमुख कारण बना।

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।11।।

‘इसलिए सब मोर्चे पर अपनी अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सभी निःसंदेह भीष्मपितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।’
दुर्योधन की बात सुनकर भीष्म पितामह उसे खुश करने के लिए जोर से शंखध्वनि करने लगे।

Friday, May 17, 2019

Srimadvagwadgeeta

श्रीमद्भगवद्गीता 




धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रो     कुरुक्षेत्रो     समवेता      युयुत्सवः।
मामकाः   पाण्डवाश्चैव   किमकुर्वत   संजय।।1।।

धृतराष्ट्र बोले, ‘हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?’

संजय को वेदव्यास जी के द्वारा दिव्य दृष्टि मिली हुई थी। इसलिए वे युद्ध का आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाने में सक्षम थे। अतः युद्ध का हाल सुनने की इच्छा से धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा कि धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित मेरे और पांडवों के पुत्रों ने क्या किया? 

संजय उवाच

दृष्टवा  तु  पाण्डवानीकं  व्यूढं  दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसम्य    राजा     वचनमब्रवीत्।।2।।
संजय बोले, ‘उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह रचनायुक्त पांडवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।’

अर्थात्् पांडव सेना की व्यूहरचना इतनी विचित्र ढंग से की गई थी कि उसे देखकर दुर्योधन चकित रह गया और वह घबराकर द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। वह सोचा कि धनुर्विद्या में पारंगत द्रोणाचार्य भीष्म पितामह को उससे भी जटिल व्यूहरचना के लिए कहेंगे।  दुर्योधन द्रोणाचार्य को अपने पास बुला सकता था, लेकिन महावीर द्रोणाचार्य के दिल में अपने लिए तहेदिल से प्रेम और भावुकता पैदा करने के लिए अधर्मी दुर्योधन चापलूसी से द्रोणाचार्य के पास गया।